Borrowed from the wall of Harvinder Singh
आरएसएस के मुखपत्र- ऑर्गेनाइजर के 30 जनवरी, 1966 के अंक में प्रकाशित अपने एक लेख में गुरु गोलवलकर लिखते हैं कि अब ये साफ होता जा रहा है कि महिलाओं को मत देने का आधिकार देने का फैसला गलत और फिजूल था. एक हिंदू होने के नाते मैं यह मानने को मजबूर हूं कि हमारे लिये अभी और बुरे दिन आनेवाले हैं. इतिहास गवाह है कि जब कहीं महिलाओं ने हुकूमत की है वहां अपराध, गैर बराबरी और अराजकता इस तरह फैली है जिसका जिक्र नहीं किया जा सकता. साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि महिला अगर विधवा हो और शासक हो जाये तो मुल्क की बदनसीबी शुरू हो जाती है. उल्लेखनीय है कि गुरु जी का यह लेख स्वर्गीय इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के एक सप्ताह बाद प्रकाशित हुआ था. श्रीमती गांधी उस समय देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं थी. इससे साबित होता है कि संघ और उसके गुरु जी महिलाओं के प्रति कितना आदर और सम्मान का भाव रखते थे.बात यहाँ पर संघ या उसके गुरुओं की ही केवल नहीं है, पूरा समाज ही इसी सोच पर आज भी आधारित है. आज भी हर महिला को अपने आप को साबित ही करना पड़ता है फिर चाहे समाज हो या परिवार। कहा तो जा रहा है की समाज बदल रहा है, सोच बदल है, पर यह बदलाव दिखाई कहाँ दे रहा है? लड़की पिता के घर हो तो भी उसे समाज को अपने अस्तित्व को साबित करना पड़ रहा है और पति का घर तो उसके लिए हमेशा ही संघर्ष का एक अखाड़ा बना रहता है, जहाँ उसे कदम कदम पर अपनी काबिलियत और पति के परिवार जनों के प्रति अपनेपन को साबित करते रहना पड़ता है.
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