गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

'बेटों को सिखाओ'


'बेटों को सिखाओ' तभी बनेंगे संस्कारित पुरुष
नारी का सम्मान करने की शिक्षा जब घर से मिलेगी, तो बाहर भी उन बेटों की नजरें झुकेंगी

जयपुर । दिल्ली में हुए निर्भया रेप और मर्डर केस के बाद इन दिनों पूरा देश कठुआ और उन्नाव के रेप केस को लेकर गुस्साया हुआ है। निर्भया केस के बाद देश की केंद्र सरकार ने जोश दिखाते हुए इस तरह के मामलों को लेकर कठोर कानून बनाने की ओर कदम बढ़ा तो लिए थे। पर क्या उस कानून के बनने के बाद देश में महिलाओं और बच्चियों के साथ हो रहे इस तरह के दुष्कर्म, उन्हें अपमानित करने वाले हादसे और उनके जीवन को बर्बादी के गर्त में धकेलने वाली घटनाओं पर रोक लगी है? यहां तक की उच्च न्यायालय की टिप्पणी थी 'निर्भया केस सदमे की सुनामी थी'। 16 दिसंबर, 2012 को हुए निर्भया कांड के बाद 3 फरवरी, 2013 को क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस आया। जिसके तहत आईपीसी की धारा 181 और 182 में बदलाव किए गए। इसमें बलात्कार से जुड़े नियमों को कड़ा किया गया। रेप करने वाले को फांसी की सजा भी मिल सके, इसका प्रावधान किया गया। 22 दिसंबर 2015 में राज्यसभा में जुवेनाइल जस्टिस बिल पास हुआ। इस एक्ट में प्रावधान किया गया कि 16 साल या उससे अधिक उम्र के बालक को जघन्य अपराध करने पर एक वयस्क मानकर मुकदमा चलाया जाएगा। बलात्कार, बलात्कार से हुई मृत्यु, गैंग रेप और एसिड-अटैक जैसे महिलाओं के साथ होने वाले अपराध जघन्य अपराध की श्रेणी में लाए गए। इसके अलावा वे सभी कानूनी अपराध जिनमें सात साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, जघन्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए। बावजूद इसके देश में इस तरह के हादसे थम गए हैं क्या?
सभी के पास इसका जवाब 'ना' में होगा। अब सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि आखिर ऐसे हादसे नियंत्रित कैसे होंगे? अकेला कानून या उसकी पालना करवाने वाली सरकार के पास जादू की ऐसी कोई छड़ी नहीं है, जिससे ऐसे अपराधों पर रोक लग सके। ऐसे कई मामलों में बड़े-बड़े बाहुबली भी शामिल होते हैं, जिन पर कानून के रक्षक चाह कर भी कोई कार्रवाई नहीं कर पाते हैं, सरकार भी लाचार बन जाती है। तो अब महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराध कैसे समाप्त हो पाएंगे। इसके लिए शुरुआत घर-परिवार से ही करनी होगी। 'बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ' का नारा कई दशकों से चला आ रहा है। इस नारे को क्रियान्वित करने में सरकारों ने जी-जान लगा दी, तब कहीं जाकर काफी हद तक कन्या भू्रण हत्याओं पर काबू पाया जा सका है और लड़कियों को शिक्षित करने में हमारा समाज आगे आया है। बेटी को जन्म लेने तो दिया जा रहा है, उसे पढ़ाया भी जा रहा है अब बात आ रही है उसके जन्म लेने के बाद जीवन और सम्मान की रक्षा की। उसके सम्मानजनक जीवन देने के लिए क्या उपाय किए जाएं, इस पर बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। उपाय और तरीके बहुत सारे हो सकते हैं, पर मेरे पास एक सुझाव है 'बेटों को सिखाओ'। इसकी शुरुआत हर उस घर-परिवार से होनी चाहिए, जिस घर में भी बेटा हो। बेटों के परिवारों को यह समझना होगा कि वे बेटों को नारी सम्मान की बातें सिखाएंगे तो वे बड़े होकर बचपन में मिली उस शिक्षा को आत्मसात कर पाएंगे। उन्हें सिखाया जाए कि सिर्फ घर की लड़कियों और महिलाओं की ही इज्जत नहीं करनी, बल्कि बाहर दिखाई देने वाली हर उस लड़की और महिला का मान रखना है, जो अन्जान ही क्यों न हो। उन्हें यह सिखाना पड़ेगा कि लड़कियां भोग करने, मजे लूटने या किसी प्रकार की दुश्मनी निकालने का जरिया नहीं है। बेटों की हर मां को अपने बेटों को नारी का सम्मान करना सिखाना होगा। यह शिक्षा जब घर से मिलेगी, तो बाहर भी फिर नारी के सम्मान में लड़कों की नजरें झुकेंगी। लड़कियों को अपनी सुरक्षा के तरीके सीखाना ही काफी नहीं है, बल्कि बेटों को सीख देनी होगी कि वे लड़कियों को सुरक्षा भरा माहौल दें। बेटों को एक अच्छा इन्सान बनाने का काम एक मां का और परिवार का ही हो सकता है, क्योंकि मां और परिवार ही बच्चे की पहली पाठशाला होती है। यह शुरुआत हमें स्वयं से, अपने ही घर से करनी होगी। यह प्रक्रिया लंबी है किंतु सतत है, इसके परिणाम दूरगामी होंगे पर अच्छे होंगे।

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